Thursday, 9 April 2015

तू न चाहे कोई भी रथ, सुपथ पर डट नही सकता

















कभी सुर्य ओजस्वी ये, तिमिर में पट नही सकता              
अकिंचन पत्र ये मेरा अवाचित फट नही सकता
बिना मरजी तेरी या-रब, कोई पत्ता नही हिलता
तू न चाहे कोई भी रथ, सुपथ पर डट नही सकता

महगीं है यहां गाडी, यहां ईमान सस्ता है
वो बाजार है दुनियां जहां ईसांन सस्ता है
पर बिक्री को स्वयं की गर तैयार तुम ना हो,
तो दाम तुम्हारा ये, कभी भी घट नही सकता

तू न चाहे कोई भी रथ, सुपथ पर डट नही सकता

नफरत की जो कडवाहट है बनकर आयी मिठाई
अदावत पे उतारू अब, यहां है अपना ही भाई
जानलो अपना ही हथियार है अपने मुकाबिल भी
अब हीरा कांच के औजार से तो कट नही सकता

तू न चाहे कोई भी रथ, सुपथ पर डट नही सकता

किसी ने मान लिया दोषी, इसी को तो मन्दिर का
कोई कहता है कातिल, इसे तो अपने ही घर का
ये देश हो खामोश दरिया तो, ये दो इसके किनारे हैं
इन किनारो से खुद के ही तो, ये हट नही सकता

तू न चाहे कोई भी रथ, सुपथ पर डट नही सकता

शब्द है रूप सच्चा, ………..  मां वीणापानी का
शब्द में ही सार, बाईबल-कुरान और गुरबानी का
शब्द ऐसे बोलना कि, …………  अर्थ न बिगड जाये
गर तीर चल जाये इक बार, तो पलट नही सकता

तू न चाहे कोई भी रथ, सुपथ पर डट नही सकता

-जितेन्द्र तायल/ तायल "जीत"
 मोब. 9456590120



Wednesday, 8 April 2015

कश्मीर हमारा है












स्वातन्त्रय का फैला चंहु ओर उजियारा है              
काले घन हमे अब न इक पल गवांरा है
माना रहनुमा तुम हो अब इसके लेकिन
याद रहे यह कश्मीर हमारा है

जिसने सात-समन्दर पार हाथ पसारा है
६७ वर्षो मे लोकतन्त्र बार-बार नकारा है
हमें प्रजा अधिकारो का पाठ पढाने वाले
याद रहे यह कश्मीर हमारा है

जिसने विस्तार-नीति का दिया नजारा है
हडप-नीति मे मित्रों घर भी पांव पसारा है
सकल विश्व को निम्न माल के ओ विक्रेता
याद रहे यह कश्मीर हमारा है

जिसने स्वहितार्थ भाईयों का किया बटवारा है
तेल हडपने हेतु सारी दुनिया मे ही मुह मारा है
हमको शान्ति, धैर्य, वार्ता का मार्ग दिखाने वाले
याद रहे यह कश्मीर हमारा है

“वसुधैव कुटुम्बकम” का मूल हमींको प्यारा है
पर भारत-भू का कोना-कोना घर से न्यारा है
अमर शहीदो ने इसको स्व-रक्त दे सवारा है
अपनी धरती को मां मानते है हम ए दुनियां

याद रहे यह कश्मीर हमारा है 

- जितेन्द्र तायल/ तायल "जीत"
मोब. 9456590120

Tuesday, 7 April 2015

कौन आयेगा












कौन आयेगा


लुटती है लाज द्रोपदी की, बचाने, कौन आयेगा
स्तबध है फिर ये पार्थ, समझाने, कौन आयेगा
दुष्ट तो बलशाली बहुत हो चुका फिर से यें आज 
.......................
सत्य गामी अकिंचन है, जिताने, कौन आयेगा

    बुद्ध ने जो बोयी क्या वही फसल है हमारा समाज 
सत्य है या फिर सत्य की बस नकल है हमारा ये आज
घायल पडी ये तीरो से, जिसे सोने की चिडिया था कहा
घायल स्वर्ण चिडिया के ये घाव, सहलाने, कौन आयेगा
........................ सत्य गामी अकिंचन है, जिताने, कौन आयेगा

है समन्दर के किनारे तू,  पर मन तो सूखा है
सैकडो पकवान तेरी थाली में, फिर भी भूखा है
भूख मिटनी हो तो काफी इक पत्ता तुलसी का
पौधा यहां शुद्ध तुलसी का, लगाने, कौन आयेगा
........................ सत्य गामी अकिंचन है, जिताने, कौन आयेगा

कृषक को अन्नदाता कहना इस देश में इक प्रथा है
अन्नदाता की थाली को नही अन्न है, बडी व्यथा है
इस व्यथा को मिटाना अब जरूरी हो तो गया है पर
प्रथा की इस व्यथा को जड से, मिटाने, कौन आयेगा

........................ सत्य गामी अकिंचन है, जिताने, कौन आयेगा


जितेन्द्र तायल/ तायल "जीत"
मोब. 9456590120




विदाई













विदाई

अपने जीवन-अंश बीज से, नाजुक बेल लगाई
हंसते-गाते खुशियों मे, आ गयी इसपे तरुनाई

कतरा-कतरा बूटा-बूटा जोडा, पूंजी येही जमाई
और कुछ है ही नही, जीवन की है यही कमाई

अब तक जिसको अपना माना, होने को है पराई
मिल जायेगा इसको सुवर, आज है इसकी विदाई

दूर होंगे मां-बाबुल अब, अखियां भी है भर आई
डोली मे लेने अपने घर, ढेरो खुशियां संग आयी

पुष्प गिरे झोली मे या-रब , जब ले तू अंगडाई
रूप लक्ष्मी  का  हो  तु , वैभैव हो तेरी परछाई




- जितेन्द्र तायल/ तायल "जीत"
 मोब. 9456590120


Thursday, 2 April 2015

मां

मां
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सप्तपदी के सब प्रण पूरे कर, उनका घर तो सवारां है,
पर हर आहट पर मेरी उन्हे भूल, मुझको ही पुचकारा है

मुझे सुलाने की खातिर, कितनी राते तो जागी तू है ही
पर मै सो भी जाऊं तब भी तूने, घन्टो मुझे निहारा है

सारे घर का प्यारा मै था, सबकी आखों का तारा भी मै था
पर जब भी चोट लगी तो जाने क्यूं, बस तुझको ही पुकारा है

मेरी खातिर भूखे रह कर, किये कितने ही व्रत तूने
पर मेरा बदाम भुलाना, इक बार न तुझको गवारां है

ऐसी उपमा कहां से लाऊं, के मां तेरा सम्मान बढे
कोई उपमा यहां लगाना ही, अपमान तुम्हारा है

तेरा उपकार चुकाना तो, अपने बस की बात नही
तेरे सपनो की हो भरपाई, तो जीवन सफल हमारा है


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-जितेन्द्र तायल/तायल "जीत"
मोब. ९४५६५९०१२०

Tuesday, 31 March 2015

बस आईने के लिए अपने जुबान मांगता हुं

बस आईने के लिए अपने जुबान मांगता हुं



















जो दोस्त हो इस जिन्दगी की शान, मांगता हुं
इक जिन्दा-दिली का मीठा पान मांगता हुं
बेजान सी जिन्दगी जी रहा हुं तेरी दुनिया मे
जिन्दा तो हुं, पर जिन्दगी मे जान मांगता हुं

बस आईने के लिए अपने जुबान मांगता हुं  …………………….

जो जचेगा सिर्फ मुझपे वो परिधान मांगता हूं
अपनी ही ए-खुदा असली पहचान मांगता हुं
सच्चे दोस्त मांगना भी छोड दुंगा मै तुझसे,
बस आईने के लिए अपने जुबान मांगता हुं

बस आईने के लिए अपने जुबान मांगता हुं  ………………………

काम आये राष्ट्र के, निज हाथो को वो काम मांगता हुं
गौरव, वैभव, ज्ञान का ये राष्ट्र हो धाम मांगता हुं
रघुनंदन के चरणो मे सादर नमन है मेरा लेकिन
न छोडे सीता को बिन-बात वो राम मांगता हुं

बस आईने के लिए अपने जुबान मांगता हुं  ……………………..

मानव जीवन मे हो खुशहाली, वो सुबह-शाम मांगता हुं
कुछ करे सत्यार्थ, शब्दो के लियें वो नाम मांगता हुं
सच्चाई के लिये समर को रहे तैयार हमेशा ये ही
अपनी कलम के लिये वरदान मांगता हुं

बस आईने के लिए अपने जुबान मांगता हुं  ………………………..

अपने जीवन मे रष्ट्र प्रेम की मधुर तान मांगता हुं
शमां-ए-वतन पर ये पतंगा हो, कुर्बान मांगता हुं
बिन राजनीति, सच्चे अर्थो मे हो समता वास जहां
बस इक ऐसा ही प्यारा हिन्दुस्तान मांगता हुं


बस आईने के लिए अपने जुबान मांगता हुं  ……………………
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- जितेन्द्र तायल/तायल "जीत"
 मोब. ९४५६५९०१२०

Monday, 30 March 2015

बडा इम्तिहान है


बडा इम्तिहान है
















रब ने जो दिया बहुत कुछ दिया है, यही तो इत्मिनान है
जानते तो है सब पर ये मानना, बडा इम्तिहान है

दो सुमन श्रद्धा के बस, और प्रेम की थोडी मिठाई
केवल इतना ही लेकर मीरा गिरिधर के पास आई
बिन साजो-सामान, उसे मनाना तो इतना आसान है
जानते तो है सब पर, ये मानना बडा इम्तिहान है

तीन कमरे का नया मकान, मैने रहने को पाया है
पर उसके हिस्से तो बंगला, आलिशान क्यूं आया है
निज सुख से नही सुखी, दुसरे के सुख से परेशान है
जानते तो है सब पर, ये मानना, बडा इम्तिहान है

जो मानता दिल से है उसे, उसके साथ तो खडा है वो
जो न माने उसके वजूद को, उससे भी कहां जुदा है वो
यही तो है खासियत तेरी ए रब, जो करती बडा हैरान है
जानते तो है सब पर, ये मानना बडा इम्तिहान है

अपना धर्म निभा मन से बस, जो चाहा तुझे अब मिलेगा
गर चूक भी गया तो गम न कर, तुझे इक सबक मिलेगा
हार से मिले सबक ही तो, अगली जीत की सही पहचान है
जानते तो है सब पर, ये मानना बडा इम्तिहान है

इस दुनियां मे बेटियां, दोनो जिम्मेदारी बखूबी निभाती हैं
पिता की राजकुमारी है तो, पति की परछाई भी कहलातीं है
बेटियां है तो ये घर, नगर, वतन सब और ये जहान है

जानते तो है सब पर, ये मानना बडा इम्तिहान है

- जितेन्द्र तायल/ तायल "जीत"
 मोब. ९४५६५९०१२०