
खाना-पीना मजे
करना, कोई जिम्मेदारी नही निभाते है
इस मस्ती मे
जानते ही नही ये जीवन कैसे बिताते है
बच्चे होने से
पहले तो सब खुद बच्चे से होते है
बच्चे ही है
जो जीवन मे आकर बडा हमे बनाते है
अपने बच्चो की
खुशी को हम घोडा बन खिलाते है
अपने घुटनो का
झूला भी बना, खूब उन्हे झुलाते है
पर क्या ये सच
नही कि, अपना खोया बचपन है यें
इनको खिलाने
के बहाने, हम खुद को ही बहलाते है
इस दुनिया के
सारे जन्तु सन्तान पे जान लुटाते है
केवल सर्प ही
सुने है जो अपने बच्चो को खाते है
ऐसा क्या अपराध
किया उस नन्ही बिटिया ने की
हम विषधर बनने
मे भी इक पल न सकुचाते है
कवि तो अपनी
कलम से इस देश को तो जगाते है
पर देश तो हम
सब देशवासी अपने घर से बनाते है
नारी अधिकारो
पर लिखना तो अब फैशन हो गया है
क्या सचमुच अपने
हम घर मे अपना धर्म निभाते है
- जितेन्द्र तायल
(स्वरचित) कॉपीराईट © 1999 – 2015 Google
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