Monday, 8 June 2015

............ सिकन्दर हो गये

















जब से पांव हमारे चादर के अन्दर हो गये                    
हम तो बिना जंग के ही सिकन्दर हो गये
॰॰
जमें से कतरे मेहनत के ही पास थे अपने
ऐसे घुले, घुलकर कतरे भी समन्दर हो गये
॰॰
जब से पाया धीरज का नन्हा सा मोती यहां
कुछ न बदला, बस पापी से कलन्दर हो गये
॰॰
जरा हिम्मत कर देख, पतंग की डोरियां भी
तूफान में कश्ती को बाधंने के लगंर हो गये
॰॰
बुरे के खिलाफ बोलना ही जिम्मेदारी है अपनी
शायर नही है, जो गांधी जी के बन्दर हो गये
॰॰
कर यकीन खुद पे, बन्दो की पनाह छोडी जब

अपने आप ऊपर वाले की छ्तरी अन्दर हो गये


-जितेन्द्र तायल
 
(स्वरचित) कॉपीराईट © 1999 – 2015 Google इस ब्लॉग के अंतर्गत लिखित/प्रकाशित सभी सामग्रियों के सर्वाधिकार सुरक्षित हैं। किसी भी लेख/कविता को कहीं और प्रयोग करने के लिए लेखक की अनुमति आवश्यक है। आप लेखक के नाम का प्रयोग किये बिना इसे कहीं भी प्रकाशित नहीं कर सकते। कॉपीराईट © 1999 – 2015 Google

Monday, 1 June 2015

काला धन - जनता की नजर में










भाग-१
सेठ जी ने कारोबार जमाया                               
जाने कितनो को उल्लु बनाया

सम्बन्धो को खूब भुनाया
अफसरो को भी खिलाया

साम-दाम-दणं-भेद सब लगाया
कुल मिलाकर खूब माल कमाया

चलते चलते सेठ जी का बेटा बडा हो गया
सेठ जी की पकी फसल सा खडा हो गया

बेटा बोला पिताजी इक बात बताओ आज
अपनी इस कामयाबी का बताओ पूरा राज

सेठ जी बोले बेटे इक बात रखना याद
कोई आये सरकार नही होओगे बर्बाद

छोटी-छोटी बातो पर नही करना खेद
ईमान मे हो जायें चाहे जितने छेद

पैसे पैसे मे न करना कभी कोई भी भेद
पैसा पैसा होता है नही होता काला या सफेद
******
******
भाग-२
एक मजदूर पत्थर तोडता था
टूटी हुई सडको को जोडता था

जब गर्मी मे माथे पर आता पसीना
चमकता था धूप मे जैसे हो नगीना

मेहनत जो की दिहाडी मिलती थी
उसी से उसकी दाल रोटी चलती थी

एक बार उसकी घरवाली ने मन में ठानी
और पुराना टी॰वी॰ घर मंगवा के ही मानी

अब तो इतवार हो या सो्मवार
टी॰वी॰ पर चलता बस चित्रहार

मजदूर ने सोचा एक बार
पढना नही आता अखबार
तो क्यो न सुने समाचार

समाचार मे हो रही थी बहस काले धन की
उसे सुन मजदूर के बच्चे की खोपडी ठनकी

बच्चे ने कहा बापू, क्या होता है काला धन
बापू बोला पता तो नही, पर कहता मेरा मन
और कुछ नही ये है बस राजनीति का फैशन

इतना कह बापू ने पुनः चित्रहार लगाया
और अपने बेटे को यही समझाया

इन चक्करो में हो जायेगे इकलौते जुते मे भी छेद
इसलिये पैसे पैसे मे न करना कभी कोई भी भेद
पैसा पैसा होता है नही होता काला या सफेद


 - जितेन्द्र तायल
 मोब. 9456590120


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Monday, 25 May 2015

.....छपने लगे है अखबार में














ताकत भी हो सारी दुनिया की अगर इख्तियार में              
जब भी चाहतें हमारी होगीं, बस तेरे इक दीदार में
॰॰

लडकर तो जीत ली है सारी लडाईयां जमाने की पर
बिना लडे ही दिल हार बैठे है, हम तेरे इस प्यार में
॰॰

माना फूलों की सारी खूबियां है तुममे ए-दोस्त पर
महकना भूलाएगा तुझे, वो महक है मेरे किरदार में
॰॰

कीमत है यहां इस दुनिया में, कुछ न कुछ सबकी
हम सा नही मिलेगा जा, ढूढंले जाके पूरे बाजार में
॰॰

जिन्दगी के चलन में खुद को भी भूल चुके थे हम
अब ये मसरूफियतें भी कटती है तेरे ही इंतजार में
॰॰

धीरज का समन्दर भी अब तो सूखने को ही है मेरा
इतनी देर करदी है मेरे हमदम तुमने इस इजहार में
॰॰

बहुत फायदा हुआ है तेरी इस बेरूखी का भी हमे तो
शायरी मे दम आ गया, हम छपने लगे है अखबार में


जितेन्द्र तायल
मोब 9456590120



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Monday, 18 May 2015

बेटी बचाओ















खाना-पीना मजे करना, कोई जिम्मेदारी नही निभाते है          
इस मस्ती मे जानते ही नही ये जीवन कैसे बिताते है
बच्चे होने से पहले तो सब खुद बच्चे से होते है
बच्चे ही है जो जीवन मे आकर बडा हमे बनाते है

अपने बच्चो की खुशी को हम घोडा बन खिलाते है
अपने घुटनो का झूला भी बना, खूब उन्हे झुलाते है
पर क्या ये सच नही कि, अपना खोया बचपन है यें
इनको खिलाने के बहाने, हम खुद को ही बहलाते है

इस दुनिया के सारे जन्तु सन्तान पे जान लुटाते है
केवल सर्प ही सुने है जो अपने बच्चो को खाते है
ऐसा क्या अपराध किया उस नन्ही बिटिया ने की
हम विषधर बनने मे भी इक पल न सकुचाते है

कवि तो अपनी कलम से इस देश को तो जगाते है
पर देश तो हम सब देशवासी अपने घर से बनाते है
नारी अधिकारो पर लिखना तो अब फैशन हो गया है
क्या सचमुच अपने हम घर मे अपना धर्म निभाते है

 - जितेन्द्र तायल

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Tuesday, 12 May 2015

सूरज को ही जग को जगाना होता है















निशाना निज लक्ष्य लगाना होता है               
पहला कदम खुद ही उठाना होता है
सूरज को जगाने जाता नही कोई
सूरज को ही जग को जगाना होता है

सपनो को लक्ष्य बनाना होता है
आंसू को पलकों में छुपाना होता है
हजार गम हो इस दिल में मगर
महफिल में तो मुस्कुराना होता है

जग का दुःख हर उठाना होता है
दिल से हर डर मिटाना होता है
लाख जलजले रोकने आयें हमें
पर यही तो घर बनाना होता है

अन्दर खुद के एक खजाना होता है
उस खजाने को ही तो पाना होता है
हर दर पर जाने की नही है जरूरत
बस उस के आगे सर झुकाना होता है

हर रिश्ते को बखूबी निभाना होता है
गैरों को भी दिल से अपनाना होता है
आसान नही है इक इसांन हो जाना
खुद को भूल दूसरो का हो जाना होता है


- जितेन्द्र तायल


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Wednesday, 6 May 2015

देख लो.................












अभिमान से हुआ कोई काम देख लो                         
कंस, रावण सभी का परिणाम देख लो
अभिमान छोड्ना पडा जगदीश को यहां
मुरारी ने लिया रणछोड नाम देख लो

अन्तर्मन में था कोहराम देख लो
नेकी ओ बदी में था संग्राम देख लो
जीती नेकनियत बदी की हार हुई तो
शान्त हुआ चित पडा आराम देख लो

तिनका चुगते हंस से गुणवान देख लो
कौवे को मोतियों का सम्मान देख लो
क्या चाहा था क्या हो गया अब, अपने
जग की हालत करुणानिधान देख लो

खोखली सरकारो का निजाम देख लो
क्या खूब किया है इन्तजाम देख लो
इनके मुआवजे की राह तकते-तकते
किसान हुआ नीलाम सरेआम देख लो

पत्थर के इसांन और मकान देख लो
बिकने को ही है सारा सामान देख लो
रिश्ते भी हो गये कारोबार का जरिया
जहनो में चलती-फिरती दूकान देख लो

-जितेन्द्र तायल
 मोब. 9456590120

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Thursday, 30 April 2015

डगमग अभी है बोट प्रिये

















कर लो मेरा विश्वास, दिल में नही है खोट प्रिये                
गहने मगंवा दूगां, पर डगमग अभी है बोट प्रिये
॰॰
सातो प्रण है याद मुझे, लिये सभी हैं घोट प्रिये
इतना गुस्सा ठीक नही, हो जायेगा विस्फोट प्रिये
॰॰
मेरे अन्तर-जन्तर-मन्तर सब तुम्हे रिझाते हैं
छोटा-मोटा नेता मैं, तुम कीमती हो वोट प्रिये
॰॰
चावल-चन्दन-कुमकुम, तुमको मेरे सब अर्पण
लक्ष्मी सेवक हम, तुम हरी-हरी सी नोट प्रिये
॰॰
घर की न्याय व्यवस्था में वकील भी तुम
जज भी तुम, बस नही है काला कोट प्रिये
॰॰
आज्ञा पालन करते है, गुस्से से ही डरते है
मत उठाओ बेलन ये, लग जायेगी चोट प्रिये


 जितेन्द्र तायल
 मोब. 9456590120

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