Tuesday, 23 June 2015

याद आता है








संग यारो के अमरूद चुराना, याद आता है                                  
बारिश में साईकिल चलाना, याद आता है
खो तो गये है इस नयी जिन्दगी मे पर
क्या खूब था गुजरा जमाना, याद आता है
................
क्या खूब था गुजरा जमाना, याद आता है


क्लास मे वो देर से आना, याद आता है
वो पीछे से सीटी बजाना , याद आता है
यारो की शरारत और फिर वो कयामत
टीचर का चश्मा छिपाना, याद आता है
..................
क्या खूब था गुजरा जमाना, याद आता है

कैन्टीन मे लैक्चर भुलाना, याद आता है
समोसे तीन-तीन मंगाना, याद आता है
वक्त ने भुलाये गीत तो सारे ही , मगर
माह्तम का टेबल बजाना, याद आता है
..................
क्या खूब था गुजरा जमाना, याद आता है

नोट्स की फोटो कराना, याद आता है
साथ पढना और पढाना, याद आता है
क्या मजा, क्या डर परिक्षा का भी था
डर मे ही सिनेमा हो आना, याद आता है
..................
क्या खूब था गुजरा जमाना, याद आता है



 जितेन्द्र तायल
मोब. 9456590120

(स्वरचित) कॉपीराईट © 1999 – 2015 Google इस ब्लॉग के अंतर्गत लिखित/प्रकाशित सभी सामग्रियों के सर्वाधिकार सुरक्षित हैं। किसी भी लेख/कविता को कहीं और प्रयोग करने के लिए लेखक की अनुमति आवश्यक है। आप लेखक के नाम का प्रयोग किये बिना इसे कहीं भी प्रकाशित नहीं कर सकते। कॉपीराईट © 1999 – 2015 Google

Tuesday, 16 June 2015

.......सोने खरे रहते है














जब तक हम लोगो के पैरों में पडे रहते है                
सच है की उनकी ही नजरों में गिरे रहते है
॰॰
फलदार होते है अक्सर जो झुकते है अदब से
छांव भी नही देते जो अकड कर खडे रहते है
॰॰ 
गैरत और अकड में अन्तर है बहुत थोडा सा ही
जाना जिसने भी, वो अपने पैरो पर खडे रहते है
॰॰ 
दिल जीत कर जिन्दा है गांधी आज भी यहां
जाने कितने हिटलर इस मिट्टी मे गडे रहते है
॰॰ 
घर छोड रोजी को, शहर में पीले गये हम
पेड से जो जुडे रहे, वो ही पत्ते हरे रहते है
॰॰ 
बदन पर हीरे जड कर नही आता कोई दुनिया में
पर जाने के बाद कुछ नाम तो हीरे से जडे रहते है
॰॰ 
सुना है हर जख्म भर देता है ये वक्त का मरहम
पर मरहम लगा भी हमारे जख्म क्यों हरे रहते है
॰॰ 
झुलस कर काले हो गये है आग मे पड कर सब
और चमक कर निखरते है जो सोने खरे रहते है


जितेन्द्र तायल
मोब. 9456590120

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Monday, 8 June 2015

............ सिकन्दर हो गये

















जब से पांव हमारे चादर के अन्दर हो गये                    
हम तो बिना जंग के ही सिकन्दर हो गये
॰॰
जमें से कतरे मेहनत के ही पास थे अपने
ऐसे घुले, घुलकर कतरे भी समन्दर हो गये
॰॰
जब से पाया धीरज का नन्हा सा मोती यहां
कुछ न बदला, बस पापी से कलन्दर हो गये
॰॰
जरा हिम्मत कर देख, पतंग की डोरियां भी
तूफान में कश्ती को बाधंने के लगंर हो गये
॰॰
बुरे के खिलाफ बोलना ही जिम्मेदारी है अपनी
शायर नही है, जो गांधी जी के बन्दर हो गये
॰॰
कर यकीन खुद पे, बन्दो की पनाह छोडी जब

अपने आप ऊपर वाले की छ्तरी अन्दर हो गये


-जितेन्द्र तायल
 
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Monday, 1 June 2015

काला धन - जनता की नजर में










भाग-१
सेठ जी ने कारोबार जमाया                               
जाने कितनो को उल्लु बनाया

सम्बन्धो को खूब भुनाया
अफसरो को भी खिलाया

साम-दाम-दणं-भेद सब लगाया
कुल मिलाकर खूब माल कमाया

चलते चलते सेठ जी का बेटा बडा हो गया
सेठ जी की पकी फसल सा खडा हो गया

बेटा बोला पिताजी इक बात बताओ आज
अपनी इस कामयाबी का बताओ पूरा राज

सेठ जी बोले बेटे इक बात रखना याद
कोई आये सरकार नही होओगे बर्बाद

छोटी-छोटी बातो पर नही करना खेद
ईमान मे हो जायें चाहे जितने छेद

पैसे पैसे मे न करना कभी कोई भी भेद
पैसा पैसा होता है नही होता काला या सफेद
******
******
भाग-२
एक मजदूर पत्थर तोडता था
टूटी हुई सडको को जोडता था

जब गर्मी मे माथे पर आता पसीना
चमकता था धूप मे जैसे हो नगीना

मेहनत जो की दिहाडी मिलती थी
उसी से उसकी दाल रोटी चलती थी

एक बार उसकी घरवाली ने मन में ठानी
और पुराना टी॰वी॰ घर मंगवा के ही मानी

अब तो इतवार हो या सो्मवार
टी॰वी॰ पर चलता बस चित्रहार

मजदूर ने सोचा एक बार
पढना नही आता अखबार
तो क्यो न सुने समाचार

समाचार मे हो रही थी बहस काले धन की
उसे सुन मजदूर के बच्चे की खोपडी ठनकी

बच्चे ने कहा बापू, क्या होता है काला धन
बापू बोला पता तो नही, पर कहता मेरा मन
और कुछ नही ये है बस राजनीति का फैशन

इतना कह बापू ने पुनः चित्रहार लगाया
और अपने बेटे को यही समझाया

इन चक्करो में हो जायेगे इकलौते जुते मे भी छेद
इसलिये पैसे पैसे मे न करना कभी कोई भी भेद
पैसा पैसा होता है नही होता काला या सफेद


 - जितेन्द्र तायल
 मोब. 9456590120


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Monday, 25 May 2015

.....छपने लगे है अखबार में














ताकत भी हो सारी दुनिया की अगर इख्तियार में              
जब भी चाहतें हमारी होगीं, बस तेरे इक दीदार में
॰॰

लडकर तो जीत ली है सारी लडाईयां जमाने की पर
बिना लडे ही दिल हार बैठे है, हम तेरे इस प्यार में
॰॰

माना फूलों की सारी खूबियां है तुममे ए-दोस्त पर
महकना भूलाएगा तुझे, वो महक है मेरे किरदार में
॰॰

कीमत है यहां इस दुनिया में, कुछ न कुछ सबकी
हम सा नही मिलेगा जा, ढूढंले जाके पूरे बाजार में
॰॰

जिन्दगी के चलन में खुद को भी भूल चुके थे हम
अब ये मसरूफियतें भी कटती है तेरे ही इंतजार में
॰॰

धीरज का समन्दर भी अब तो सूखने को ही है मेरा
इतनी देर करदी है मेरे हमदम तुमने इस इजहार में
॰॰

बहुत फायदा हुआ है तेरी इस बेरूखी का भी हमे तो
शायरी मे दम आ गया, हम छपने लगे है अखबार में


जितेन्द्र तायल
मोब 9456590120



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Monday, 18 May 2015

बेटी बचाओ















खाना-पीना मजे करना, कोई जिम्मेदारी नही निभाते है          
इस मस्ती मे जानते ही नही ये जीवन कैसे बिताते है
बच्चे होने से पहले तो सब खुद बच्चे से होते है
बच्चे ही है जो जीवन मे आकर बडा हमे बनाते है

अपने बच्चो की खुशी को हम घोडा बन खिलाते है
अपने घुटनो का झूला भी बना, खूब उन्हे झुलाते है
पर क्या ये सच नही कि, अपना खोया बचपन है यें
इनको खिलाने के बहाने, हम खुद को ही बहलाते है

इस दुनिया के सारे जन्तु सन्तान पे जान लुटाते है
केवल सर्प ही सुने है जो अपने बच्चो को खाते है
ऐसा क्या अपराध किया उस नन्ही बिटिया ने की
हम विषधर बनने मे भी इक पल न सकुचाते है

कवि तो अपनी कलम से इस देश को तो जगाते है
पर देश तो हम सब देशवासी अपने घर से बनाते है
नारी अधिकारो पर लिखना तो अब फैशन हो गया है
क्या सचमुच अपने हम घर मे अपना धर्म निभाते है

 - जितेन्द्र तायल

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Tuesday, 12 May 2015

सूरज को ही जग को जगाना होता है















निशाना निज लक्ष्य लगाना होता है               
पहला कदम खुद ही उठाना होता है
सूरज को जगाने जाता नही कोई
सूरज को ही जग को जगाना होता है

सपनो को लक्ष्य बनाना होता है
आंसू को पलकों में छुपाना होता है
हजार गम हो इस दिल में मगर
महफिल में तो मुस्कुराना होता है

जग का दुःख हर उठाना होता है
दिल से हर डर मिटाना होता है
लाख जलजले रोकने आयें हमें
पर यही तो घर बनाना होता है

अन्दर खुद के एक खजाना होता है
उस खजाने को ही तो पाना होता है
हर दर पर जाने की नही है जरूरत
बस उस के आगे सर झुकाना होता है

हर रिश्ते को बखूबी निभाना होता है
गैरों को भी दिल से अपनाना होता है
आसान नही है इक इसांन हो जाना
खुद को भूल दूसरो का हो जाना होता है


- जितेन्द्र तायल


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